“आर्थिक समीक्षा 2025-26 में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPFs) जैसे बर्गर, नूडल्स, पिज्जा और कोल्ड ड्रिंक के विज्ञापनों पर सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक बैन का सुझाव दिया गया है। यह प्रस्ताव बच्चों में बढ़ते मोटापे, गैर-संचारी रोगों (NCDs) के 57% मामलों और UPFs की बिक्री में 150% वृद्धि को ध्यान में रखकर आया है। साथ ही, उच्च GST स्लैब, चेतावनी लेबल और बच्चों के लिए मार्केटिंग प्रतिबंध की सिफारिश की गई है।”
आर्थिक समीक्षा में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPFs) को स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बताया गया है, जिसमें उच्च वसा, नमक और शर्करा वाले उत्पाद जैसे बर्गर, इंस्टेंट नूडल्स, पिज्जा और कोल्ड ड्रिंक शामिल हैं। इन उत्पादों की बढ़ती खपत भारत को दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक बना रही है, जिससे मोटापा और इससे जुड़ी बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। समीक्षा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ऐसे विज्ञापनों को सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक सभी मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंधित करने की संभावना तलाशी जाए, क्योंकि यह समय बच्चों और युवाओं के लिए सबसे अधिक प्रभावी होता है।
मोटापे की समस्या अब हर आयु वर्ग में फैल रही है, जहां ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं में 20% से अधिक और शहरी पुरुषों में 25% तक पहुंच चुकी है। बच्चों में यह दर पिछले दशक में दोगुनी हो गई है, जो UPFs की आसान उपलब्धता और आकर्षक विज्ञापनों से जुड़ी है। गैर-संचारी रोग जैसे डायबिटीज, हृदय रोग और कैंसर अब देश में 57% मौतों के लिए जिम्मेदार हैं, और इनमें से कई मामलों का सीधा संबंध अस्वास्थ्यकर आहार से है। समीक्षा में उल्लेख किया गया है कि UPFs पारंपरिक आहार को विस्थापित कर रहे हैं, जिससे पोषण की गुणवत्ता गिर रही है और क्रॉनिक बीमारियों का जोखिम बढ़ रहा है।
UPFs की बिक्री में पिछले 14 वर्षों में 150% की वृद्धि दर्ज की गई है, जो मुख्य रूप से युवा उपभोक्ताओं की वजह से है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे उत्पादों का सालाना कारोबार अब लाखों करोड़ रुपये में पहुंच चुका है, जिसमें ब्रांड जैसे Maggi, Burger King, Domino’s और Coca-Cola प्रमुख हैं। यह वृद्धि डिजिटल मार्केटिंग और टीवी विज्ञापनों से प्रेरित है, जो बच्चों को आकर्षित करने के लिए कार्टून कैरेक्टर्स और सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट का इस्तेमाल करते हैं। समीक्षा में चेतावनी दी गई है कि यदि ऐसे विज्ञापनों पर काबू नहीं पाया गया, तो स्वास्थ्य व्यय में भारी बढ़ोतरी होगी, जो पहले से ही GDP का 2.5% हिस्सा ले रहा है।
सुझावित उपायों में विज्ञापन बैन के अलावा, UPFs पर उच्चतम GST स्लैब लगाने की बात कही गई है, जो वर्तमान 18% से बढ़कर 28% हो सकता है। इससे कीमतें बढ़ेंगी और खपत कम होगी, जैसा कि तंबाकू उत्पादों पर देखा गया है। साथ ही, पैकेजिंग पर बड़े चेतावनी लेबल अनिवार्य करने का प्रस्ताव है, जिसमें उच्च कैलोरी, शुगर और फैट की मात्रा स्पष्ट रूप से दर्शाई जाए। शिशु और छोटे बच्चों के दूध तथा पेय पदार्थों की मार्केटिंग पर सख्त प्रतिबंध की सिफारिश की गई है, क्योंकि ये उत्पाद अक्सर पोषण से अधिक लाभ कमाने पर केंद्रित होते हैं।
मोटापे की दरें: आयु वर्ग के अनुसार (NFHS डेटा पर आधारित अनुमान)
| आयु वर्ग | ग्रामीण महिलाएं (%) | शहरी महिलाएं (%) | ग्रामीण पुरुष (%) | शहरी पुरुष (%) |
|---|---|---|---|---|
| 5-14 वर्ष | 12 | 18 | 10 | 15 |
| 15-29 वर्ष | 18 | 25 | 15 | 22 |
| 30-49 वर्ष | 22 | 30 | 20 | 28 |
| 50+ वर्ष | 20 | 28 | 18 | 25 |
यह टेबल दर्शाती है कि शहरी क्षेत्रों में मोटापा अधिक है, जहां UPFs की पहुंच आसान है। समीक्षा में जोर दिया गया है कि नीतिगत बदलावों से इन दरों को 10-15% तक कम किया जा सकता है, यदि विज्ञापन प्रतिबंध और कर वृद्धि लागू की जाए।
प्रमुख सुझाव और उनके संभावित प्रभाव
विज्ञापन बैन (6 AM से 11 PM): बच्चों के स्कूल और प्ले टाइम को लक्षित कर, यह उपाय UPFs की मांग को 20-30% कम कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों जैसे UK और Mexico में इसी तरह के बैन से युवा उपभोक्ताओं में कैलोरी इनटेक घटा है।
उच्च GST स्लैब: 28% टैक्स से उत्पादों की कीमत 10-15% बढ़ेगी, जो निम्न-मध्यम वर्ग को प्रभावित करेगा और स्वस्थ विकल्पों जैसे फल-सब्जियों की ओर मोड़ेगा। अनुमान है कि इससे सरकारी राजस्व में 5,000 करोड़ रुपये की वृद्धि हो सकती है, जिसे स्वास्थ्य कार्यक्रमों में निवेश किया जा सकता है।
चेतावनी लेबल: ब्राजील और चिली मॉडल की तरह, बड़े काले लेबल से उपभोक्ता जागरूकता बढ़ेगी। अध्ययनों से पता चलता है कि ऐसे लेबल से शुगर-युक्त पेय की बिक्री 25% गिर सकती है।
बच्चों के लिए मार्केटिंग प्रतिबंध: सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट और ऑनलाइन प्रचार पर रोक से, इंफैंट फॉर्मूला और टॉडलर ड्रिंक्स की अनावश्यक खपत रुकेगी, जो वर्तमान में 40% बाजार हिस्सेदारी रखते हैं।
इन सुझावों का कार्यान्वयन चुनौतीपूर्ण होगा, क्योंकि FMCG कंपनियां जैसे Nestle, PepsiCo और Unilever बड़े बाजार प्लेयर हैं और लॉबिंग कर सकती हैं। हालांकि, समीक्षा में कहा गया है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देकर, नीतियां बनाई जाएं जो आर्थिक विकास को भी समर्थन दें। UPFs की जगह स्थानीय, पोषक आहार को बढ़ावा देने से कृषि क्षेत्र मजबूत होगा और रोजगार बढ़ेगा।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ये उपाय अपनाए गए, तो अगले 5 वर्षों में NCDs से होने वाली मौतों में 10% कमी आ सकती है, जो आर्थिक उत्पादकता को बढ़ाएगा। समीक्षा में नीतियों को समन्वित करने की बात कही गई है, जिसमें शिक्षा मंत्रालय के साथ मिलकर स्कूलों में जंक फूड बैन और पोषण शिक्षा शामिल है। अंत में, उपभोक्ताओं को सलाह दी गई है कि वे लेबल पढ़ें और घरेलू भोजन को प्राथमिकता दें, ताकि व्यक्तिगत स्तर पर बदलाव हो सके।
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