“छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के किसान राजेंद्र कुमार साहू ने पराली को मशरूम की खेती के लिए इस्तेमाल कर अपनी आय बढ़ाई है। वे 150-200 एकड़ से इकट्ठा पराली पर पैडी स्ट्रॉ मशरूम उगाते हैं, जिससे रोजाना 50 किलो उत्पादन होता है और ₹10,000 की कमाई। इससे प्रदूषण रुकता है और हजारों किसानों को ट्रेनिंग मिल रही है, जो अतिरिक्त आमदनी का स्रोत बन रहा है।”
छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बसना तहसील में रहने वाले राजेंद्र कुमार साहू ने पराली जलाने की समस्या को अवसर में बदल दिया। तीन एमए डिग्री धारक साहू ने पैडी स्ट्रॉ मशरूम की खेती शुरू की, जहां पराली को सब्सट्रेट के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। वे आम के पेड़ों के नीचे बेड तैयार करते हैं, जो छाया और नमी प्रदान करते हैं। प्रत्येक बेड 15 दिनों में 1 किलो मशरूम देता है, और कुल उत्पादन रोजाना 50 किलो तक पहुंचता है। बाजार में ₹200 प्रति किलो की दर से बिक्री से नेट कमाई ₹10,000 रोजाना हो रही है।
यह तरीका न केवल आर्थिक रूप से फायदेमंद है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान देता है। भारत में सालाना 500 मिलियन टन फसल अवशेष उत्पन्न होता है, जिसमें से बड़ा हिस्सा जलाया जाता है, लेकिन साहू 150-200 एकड़ से पराली इकट्ठा कर जलाने से रोकते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और वायु प्रदूषण कम होता है। छत्तीसगढ़ की उपोष्णकटिबंधीय जलवायु (25-30 डिग्री सेल्सियस) मशरूम की खेती के लिए आदर्श है, जहां पैडी स्ट्रॉ और ओएस्टर वैरायटी प्रमुख हैं।
साहू की सफलता ने स्थानीय किसानों को प्रेरित किया। वे हजारों लोगों को मुफ्त ट्रेनिंग देते हैं, जिसमें सब्सट्रेट तैयारी, स्पॉन इंजेक्शन और हार्वेस्टिंग शामिल है। मशरूम की खेती में कम निवेश की जरूरत होती है, और यह पारंपरिक फसलों से अतिरिक्त आय देती है। उदाहरण के लिए, एक एकड़ में पराली से 2-3 टन कम्पोस्ट बन सकती है, जो उर्वरक के रूप में उपयोगी है।
मशरूम खेती की प्रक्रिया: प्रमुख चरण
पराली संग्रहण: धान की कटाई के बाद पराली इकट्ठा करें, जो सेल्यूलोज से भरपूर होती है।
सब्सट्रेट तैयारी: पराली को पानी में भिगोकर स्टरलाइज करें, फिर स्पॉन मिलाएं।
बेड सेटअप: आम के पेड़ों के नीचे 1×1 मीटर बेड बनाएं, जो 15-20 दिनों में तैयार हो जाते हैं।
हार्वेस्टिंग: मशरूम को हाथ से तोड़ें, ताजा बेचें या सुखाकर स्टोर करें।
मार्केटिंग: लोकल बाजार, होटल या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बेचें, जहां मांग बढ़ रही है।
लागत और रिटर्न की तालिका
| मद | लागत (₹ प्रति एकड़) | रिटर्न (₹ प्रति साइकल) | लाभ (%) |
|---|---|---|---|
| पराली संग्रहण और तैयारी | 5,000 | – | – |
| स्पॉन और सामग्री | 10,000 | – | – |
| लेबर और मेंटेनेंस | 15,000 | – | – |
| कुल उत्पादन (किलो) | – | 1,000 | – |
| बिक्री (@₹200/किलो) | – | 2,00,000 | 150 |
| नेट लाभ | – | 1,70,000 | – |
यह तालिका एक साइकल (3 महीने) पर आधारित है, जहां साल में 3-4 साइकल संभव हैं। कम निवेश (कुल ₹30,000) से उच्च रिटर्न मिलता है, जो पारंपरिक फसलों से 3-4 गुना ज्यादा है।
फायदे और चुनौतियां
आर्थिक फायदे: किसान अतिरिक्त आय कमा सकते हैं, जैसे साहू की तरह ₹10,000 रोजाना। मशरूम बाजार भारत में 10% सालाना बढ़ रहा है, निर्यात अवसर भी हैं।
पर्यावरणीय लाभ: पराली जलाने से CO2 उत्सर्जन कम होता है, मिट्टी में पोषक तत्व वापस आते हैं।
सामाजिक प्रभाव: महिलाओं और युवाओं के लिए रोजगार, जैसा कि सुंदरगढ़ जिले में 1,000 परिवारों ने अपनाया।
चुनौतियां: नमी नियंत्रण जरूरी, कीट संक्रमण से बचाव। सरकारी सब्सिडी (जैसे क्रॉप रेसिड्यू मैनेजमेंट स्कीम) से मदद मिलती है।
साहू का मॉडल दिखाता है कि पराली को कचरा नहीं, संसाधन मानकर किसान अपनी तकदीर बदल सकते हैं। इससे न केवल व्यक्तिगत कमाई बढ़ती है, बल्कि समुदाय स्तर पर सस्टेनेबल फार्मिंग को बढ़ावा मिलता है। अन्य राज्यों जैसे पंजाब और हरियाणा में भी यह अपनाया जा रहा है, जहां पराली प्रबंधन से अतिरिक्त आय स्रोत बन रहे हैं।
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